The Vision of Śiva· 6.89 / 126

The Vision of Śiva6.89

6.89
सर्वत्र सारभूतत्वात्सर्वत्रैवाजडत्वतः । सर्वभावस्वभावत्वादभावस्यापि भावतः ॥८९॥
sarvatra sārabhūtatvātsarvatraivājaḍatvataḥ | sarvabhāvasvabhāvatvādabhāvasyāpi bhāvataḥ
— सर्वत्र ; — सारभूत होने के कारण ; — सर्वत्र ही ; — अजड़ होने के कारण ; — समस्त भावों का स्वभाव होने के कारण ; — अभाव का भी ; — भाव होने के कारण

(यह) सर्वत्र (सिद्ध होता है), क्योंकि (संवित्) सर्वत्र सारभूत है; सर्वत्र ही, क्योंकि वह अजड़ है; क्योंकि वह समस्त भावों का स्वभाव है; और क्योंकि अभाव भी (वस्तुतः एक भावात्मक) भाव ही है।