अप्रत्यक्षोऽक्षसम्बन्धो दूरस्थः शक्तिरूह्यते ।
तस्मान्न ज्ञानशून्यत्वं न शून्यं चोपपद्यते ॥८३॥
apratyakṣo'kṣasambandho dūrasthaḥ śaktirūhyate |
tasmānna jñānaśūnyatvaṃ na śūnyaṃ copapadyate
(वस्तु का) इन्द्रिय के साथ सम्बन्ध अप्रत्यक्ष (होते हुए), दूर स्थित (होते हुए भी, उसकी) शक्ति अनुमित होती है; इसलिए न (कोई) ज्ञान-शून्यता है, और न ही शून्य (का सिद्धान्त) उपपन्न होता है।