तस्याप्यवस्तुरूपत्वे न किंचित्कथितं भवेत् ।
एतावान् वाच्यसम्बन्धो यदन्तःस्फुरणात्मता ॥८१॥
tasyāpyavasturūpatve na kiṃcitkathitaṃ bhavet |
etāvān vācyasambandho yadantaḥsphuraṇātmatā
और यदि वह (अपोहित अर्थ) भी अवस्तु-रूप (असत्) हो, तो (शब्द द्वारा) कुछ भी कहा हुआ न होगा। (वस्तुतः) वाच्य का सम्बन्ध इतना ही है — कि (वह) अन्तः-स्फुरण-स्वरूप (चित् के भीतर स्फुरित होना) है।