The Vision of Śiva· 6.81 / 126

The Vision of Śiva6.81

6.81
तस्याप्यवस्तुरूपत्वे न किंचित्कथितं भवेत् । एतावान् वाच्यसम्बन्धो यदन्तःस्फुरणात्मता ॥८१॥
tasyāpyavasturūpatve na kiṃcitkathitaṃ bhavet | etāvān vācyasambandho yadantaḥsphuraṇātmatā
— उस (अपोहित) का भी ; — अवस्तु-रूप (असत्) होने पर ; — कुछ नहीं ; — कहा हुआ ; — होगा ; — इतना ही ; — वाच्य का सम्बन्ध ; — कि ; — अन्तः-स्फुरण-स्वरूप (चित् के भीतर स्फुरित होना)

और यदि वह (अपोहित अर्थ) भी अवस्तु-रूप (असत्) हो, तो (शब्द द्वारा) कुछ भी कहा हुआ न होगा। (वस्तुतः) वाच्य का सम्बन्ध इतना ही है — कि (वह) अन्तः-स्फुरण-स्वरूप (चित् के भीतर स्फुरित होना) है।