निवृत्ते वाच्यसम्बन्धे प्रद्वेषो विधिगः परम् ।
अघटत्वं न सामान्यं किं न वा ह्यविशेषकम् ॥८०॥
nivṛtte vācyasambandhe pradveṣo vidhigaḥ param |
aghaṭatvaṃ na sāmānyaṃ kiṃ na vā hyaviśeṣakam
वाच्य (विधेय अर्थ) के सम्बन्ध के निवृत्त (हटा देने) पर, (तुम्हारा विधि के प्रति) प्रद्वेष (विरोध) अन्ततः विधि (विधान/भाव) पर ही जा टिकता है; और क्या अघटत्व (न-घट-पन) सामान्य नहीं (है)? अथवा वह (भी) अविशेषक (कुछ विशेष न बतलाने वाला, अतः व्यर्थ) क्यों नहीं?