The Vision of Śiva· 6.8 / 126

The Vision of Śiva6.8

6.8
येऽन्ये वेदान्तविद्वांस आत्मब्रह्मैव विश्वताम् । यात्युपादानरूपत्वात्तथान्ये भ्रान्तिरूपताम् ॥८॥
ye'nye vedāntavidvāṃsa ātmabrahmaiva viśvatām | yātyupādānarūpatvāttathānye bhrāntirūpatām
— जो अन्य ; — वेदान्तज्ञ ; — आत्म-ब्रह्म ही ; — विश्वता (विश्व-रूप) ; — प्राप्त होता है ; — उपादान-रूप होने के कारण ; — और इसी प्रकार अन्य ; — भ्रान्ति-रूपता को

जो अन्य वेदान्तज्ञ हैं, (वे कहते हैं कि) आत्म-ब्रह्म ही उपादान-रूप होने के कारण विश्वता (विश्व-रूप) को प्राप्त होता है; और इसी प्रकार अन्य (विश्व को) भ्रान्ति-रूप (मानते हैं)।