येऽन्ये वेदान्तविद्वांस आत्मब्रह्मैव विश्वताम् ।
यात्युपादानरूपत्वात्तथान्ये भ्रान्तिरूपताम् ॥८॥
ye'nye vedāntavidvāṃsa ātmabrahmaiva viśvatām |
yātyupādānarūpatvāttathānye bhrāntirūpatām
जो अन्य वेदान्तज्ञ हैं, (वे कहते हैं कि) आत्म-ब्रह्म ही उपादान-रूप होने के कारण विश्वता (विश्व-रूप) को प्राप्त होता है; और इसी प्रकार अन्य (विश्व को) भ्रान्ति-रूप (मानते हैं)।