The Vision of Śiva· 6.7 / 126

The Vision of Śiva6.7

6.7
भावा भवेयुस्तत्प्राप्ता ह्यस्माकं सर्वसत्यता । अविद्यादेरयोगश्चेत्तेनैतदतिरिक्तता ॥७॥
bhāvā bhaveyustatprāptā hyasmākaṃ sarvasatyatā | avidyāderayogaścettenaitadatiriktatā
— भाव ; — होंगे ; — उस (तत्त्व) को प्राप्त ; — निश्चय ही ; — हमारे लिए ; — सर्व-सत्यता ; — अविद्या आदि का ; — अयोग ; — यदि ; — उससे ; — यह ; — अतिरिक्तता (व्यर्थता)

(हमारे मत में) भाव उस (एक तत्त्व) को प्राप्त होंगे — हमारे लिए सर्व-सत्यता है; (किन्तु) यदि (कहो कि) अविद्या आदि का (ब्रह्म से) अयोग है, तो उसी से यह (ब्रह्म में विचित्रता का विचार) अतिरिक्त (व्यर्थ) हो जाता है।