नश्वरानश्वरत्वेऽपि स्वभावे प्रविकल्पनाः ।
अत्र नैव प्रवर्तन्ते हेतुसन्निधिनश्वराः ॥७५॥
naśvarānaśvaratve'pi svabhāve pravikalpanāḥ |
atra naiva pravartante hetusannidhinaśvarāḥ
(किसी वस्तु के) स्वभाव में नश्वर-अनश्वर होने के विकल्प (विस्तार) यहाँ (हमारे मत में) उठते ही नहीं — (जो मानते हैं कि वस्तुएँ) हेतु (विनाशक कारण) की सन्निधि में (ही) नश्वर (होती) हैं।