कपालादिकजन्यत्वमभावस्तस्य संगता ।
सत्यस्य कारणापेक्षा घटादिजनने यथा ॥७४॥
kapālādikajanyatvamabhāvastasya saṃgatā |
satyasya kāraṇāpekṣā ghaṭādijanane yathā
(केवल हमारे मत में) अभाव (घट-नाश) का कपाल (ठीकरे) आदि से जन्यत्व (उत्पाद्यता) संगत होता है; (क्योंकि) सत् की कारण पर अपेक्षा (होती है), जैसे घट आदि की उत्पत्ति में (— अभाव भी स्थायी द्रव्य की एक भाव-अवस्था है)।