The Vision of Śiva· 6.73 / 126

The Vision of Śiva6.73

6.73
अकार्यत्वाद्विनाशस्य प्रतिबन्धो नचापि ते । स्थिरस्य प्रतिबन्ध्यत्वात् क्षणिकस्य न युज्यते ॥७३॥
akāryatvādvināśasya pratibandho nacāpi te | sthirasya pratibandhyatvāt kṣaṇikasya na yujyate
— विनाश के कार्य (उत्पाद्य) न होने के कारण ; — विनाश का ; — प्रतिबन्ध (निरोध) ; — और भी नहीं ; — तुम्हारे लिए ; — स्थिर का ; — प्रतिबन्ध्य होने के कारण ; — क्षणिक का ; — सम्भव नहीं

और चूँकि तुम्हारे (मत में) विनाश कार्य (उत्पाद्य) नहीं, अतः उसका (कारण द्वारा) प्रतिबन्ध (निरोध) भी तुम्हारे लिए सम्भव नहीं; क्योंकि स्थिर (वस्तु) ही प्रतिबन्ध्य (निरोध्य) होती है, क्षणिक का (निरोध) सम्भव नहीं (अतः तुम्हारे मत में कार्य-कारण ही टूट जाता है)।