अकार्यत्वाद्विनाशस्य प्रतिबन्धो नचापि ते ।
स्थिरस्य प्रतिबन्ध्यत्वात् क्षणिकस्य न युज्यते ॥७३॥
akāryatvādvināśasya pratibandho nacāpi te |
sthirasya pratibandhyatvāt kṣaṇikasya na yujyate
और चूँकि तुम्हारे (मत में) विनाश कार्य (उत्पाद्य) नहीं, अतः उसका (कारण द्वारा) प्रतिबन्ध (निरोध) भी तुम्हारे लिए सम्भव नहीं; क्योंकि स्थिर (वस्तु) ही प्रतिबन्ध्य (निरोध्य) होती है, क्षणिक का (निरोध) सम्भव नहीं (अतः तुम्हारे मत में कार्य-कारण ही टूट जाता है)।