कुतो घटस्य जननाकारनामावधारणम् ।
यावता प्राग्दशानष्टा न प्रवृत्तिरथान्यथा ॥७१॥
kuto ghaṭasya jananākāranāmāvadhāraṇam |
yāvatā prāgdaśānaṣṭā na pravṛttirathānyathā
घट के जनन, आकार और नाम का अवधारण (निश्चय) कहाँ से (हो) — जब तक कि पूर्व-दशा (मिट्टी की अवस्था) अनष्ट है (घट के प्रकट होने पर)? (यदि वह नष्ट होती, तो) कोई (निरन्तर) प्रवृत्ति (घट को उत्पन्न करने वाली) न होती; अतः (बात) अन्यथा (है, क्षणिकवादी के विपरीत)।