The Vision of Śiva· 6.70 / 126

The Vision of Śiva6.70

6.70
किं विधाय घटं नो वा स मृत्पिण्डोऽभिधीयताम् । अकृत्वाकरणं कुम्भे कृत्वा तस्य स्वरूपिता ॥७०॥
kiṃ vidhāya ghaṭaṃ no vā sa mṛtpiṇḍo'bhidhīyatām | akṛtvākaraṇaṃ kumbhe kṛtvā tasya svarūpitā
— क्या बनाकर ; — घट ; — अथवा नहीं ; — वह मृत्पिण्ड ; — कहो ; — न बनाकर ; — अकरण (न बनना) ; — जार के विषय में ; — बनाकर ; — उसका ; — अपने स्वरूप में अवस्थान

कहो: क्या वह मृत्पिण्ड घट को बनाकर (नष्ट होता है), अथवा नहीं? यदि (घट को) न बनाकर (नष्ट हो), तो घट का अकरण (न बनना आता है); और बनाकर (शेष रहे तो) उसका अपने स्वरूप में अवस्थान (आता है — दोनों ही प्रकार से क्षणिकता विफल)।