रूपे हेत्वन्तरापेक्षा यत्र तत्र तथा कृता ।
घटस्य नश्वरात्मत्वे मुद्गरादेरपेक्षणम् ॥६७॥
rūpe hetvantarāpekṣā yatra tatra tathā kṛtā |
ghaṭasya naśvarātmatve mudgarāderapekṣaṇam
जहाँ-जहाँ (किसी नए) रूप में (अन्य) हेतु की अपेक्षा की जाती है, (वह पूर्व वस्तु के स्थायित्व को सूचित करती है); (जबकि) यदि घट का स्वरूप ही नश्वर हो, तो मुद्गर (हथौड़े) आदि की अपेक्षा (उसे तोड़ने में व्यर्थ होगी)।