The Vision of Śiva· 6.67 / 126

The Vision of Śiva6.67

6.67
रूपे हेत्वन्तरापेक्षा यत्र तत्र तथा कृता । घटस्य नश्वरात्मत्वे मुद्गरादेरपेक्षणम् ॥६७॥
rūpe hetvantarāpekṣā yatra tatra tathā kṛtā | ghaṭasya naśvarātmatve mudgarāderapekṣaṇam
— (नए) रूप में ; — अन्य हेतु की अपेक्षा ; — जहाँ-जहाँ ; — वैसी की जाती है ; — घट का ; — स्वरूप नश्वर होने पर ; — मुद्गर (हथौड़े) आदि की ; — अपेक्षा (व्यर्थ)

जहाँ-जहाँ (किसी नए) रूप में (अन्य) हेतु की अपेक्षा की जाती है, (वह पूर्व वस्तु के स्थायित्व को सूचित करती है); (जबकि) यदि घट का स्वरूप ही नश्वर हो, तो मुद्गर (हथौड़े) आदि की अपेक्षा (उसे तोड़ने में व्यर्थ होगी)।