किं वा नाश्यं न मृत्पिण्डं घटस्य जनकं भवेत् ।
तदनाशे न किंचित्स्याद्घट एव न जायते ॥६८॥
kiṃ vā nāśyaṃ na mṛtpiṇḍaṃ ghaṭasya janakaṃ bhavet |
tadanāśe na kiṃcitsyādghaṭa eva na jāyate
अथवा क्या नाश्य (नष्ट होने वाला) मृत्पिण्ड घट का जनक नहीं हो सकता? यदि वह (मिट्टी) नष्ट न हो, तो कुछ भी उत्पन्न नहीं होगा; (और यदि पूर्णतः नष्ट हो, तो) घट ही उत्पन्न नहीं होता (शून्य से)।