The Vision of Śiva· 6.62 / 126

The Vision of Śiva6.62

6.62
अन्यत्वेऽन्यसमुत्पत्तौ घटस्यायातमत्र किम् । आत्मना परतो वापि विनाशेऽत्रापि तादृशाः ॥६२॥
anyatve'nyasamutpattau ghaṭasyāyātamatra kim | ātmanā parato vāpi vināśe'trāpi tādṛśāḥ
— अन्य होने पर ; — (मात्र) अन्य की उत्पत्ति में ; — घट का ; — यहाँ क्या बना ; — अपने आप से ; — अथवा अन्य से ; — विनाश के विषय में ; — यहाँ भी ; — वैसे ही (विकल्प)

और यदि (वह नाश घट से) अन्य (हो) — तो (किसी मात्र) अन्य की उत्पत्ति में घट का यहाँ क्या (बना, जो शेष रहता है)? और (घट के) विनाश के विषय में — चाहे (वह) अपने आप से (हो), अथवा अन्य से — यहाँ भी वैसे ही (असंगत विकल्प आते हैं)।