अन्यत्वेऽन्यसमुत्पत्तौ घटस्यायातमत्र किम् ।
आत्मना परतो वापि विनाशेऽत्रापि तादृशाः ॥६२॥
anyatve'nyasamutpattau ghaṭasyāyātamatra kim |
ātmanā parato vāpi vināśe'trāpi tādṛśāḥ
और यदि (वह नाश घट से) अन्य (हो) — तो (किसी मात्र) अन्य की उत्पत्ति में घट का यहाँ क्या (बना, जो शेष रहता है)? और (घट के) विनाश के विषय में — चाहे (वह) अपने आप से (हो), अथवा अन्य से — यहाँ भी वैसे ही (असंगत विकल्प आते हैं)।