कुर्वन् वा किं तदा कुर्वन् न भावं तद्घटादिकात् ।
अनन्यं व्यतिरिक्तं वा यर्ह्यनन्यस्तथाविधः ॥६१॥
kurvan vā kiṃ tadā kurvan na bhāvaṃ tadghaṭādikāt |
ananyaṃ vyatiriktaṃ vā yarhyananyastathāvidhaḥ
अथवा (कुछ) करते हुए — तब क्या करते हुए? घट आदि से (अपना नाश रूप) भाव (वस्तु वह) नहीं (उत्पन्न कर सकता), चाहे (वह नाश घट से) अनन्य (अभिन्न) हो या व्यतिरिक्त (भिन्न); क्योंकि जब (वह) अनन्य (हो), तो (वह नाश) वैसा ही (अर्थात् घट ही) हो जाता है।