The Vision of Śiva· 6.55 / 126

The Vision of Śiva6.55

6.55
यत्सत्तत्क्षणिकत्वेऽपि सत्त्वमप्यक्षगोचरं । सादृश्याद्भ्रान्तमक्षं चेददुष्टं प्राग्ग्रहे यथा ॥५५॥
yatsattatkṣaṇikatve'pi sattvamapyakṣagocaraṃ | sādṛśyādbhrāntamakṣaṃ cedaduṣṭaṃ prāggrahe yathā
— जो सत् ; — वह क्षणिकता मानने पर भी ; — सत्त्व भी ; — इन्द्रिय-गोचर ; — सादृश्य से ; — भ्रान्त ; — इन्द्रिय ; — यदि ; — अदुष्ट (अभ्रान्त) ; — पूर्व-ग्रहण में ; — उसी प्रकार

(वे कहते हैं) 'जो सत् है वह क्षणिक है'; (किन्तु) उनकी क्षणिकता मानने पर भी, सत्त्व (अस्तित्व) इन्द्रिय-गोचर (इन्द्रिय का विषय) है (जो स्थायित्व को ग्रहण करता है)। यदि (कहो कि) सादृश्य से इन्द्रिय भ्रान्त हो जाती है — (तो वह) पूर्व-ग्रहण में अदुष्ट (अभ्रान्त) थी, उसी प्रकार (अब भी)।