यत्सत्तत्क्षणिकत्वेऽपि सत्त्वमप्यक्षगोचरं ।
सादृश्याद्भ्रान्तमक्षं चेददुष्टं प्राग्ग्रहे यथा ॥५५॥
yatsattatkṣaṇikatve'pi sattvamapyakṣagocaraṃ |
sādṛśyādbhrāntamakṣaṃ cedaduṣṭaṃ prāggrahe yathā
(वे कहते हैं) 'जो सत् है वह क्षणिक है'; (किन्तु) उनकी क्षणिकता मानने पर भी, सत्त्व (अस्तित्व) इन्द्रिय-गोचर (इन्द्रिय का विषय) है (जो स्थायित्व को ग्रहण करता है)। यदि (कहो कि) सादृश्य से इन्द्रिय भ्रान्त हो जाती है — (तो वह) पूर्व-ग्रहण में अदुष्ट (अभ्रान्त) थी, उसी प्रकार (अब भी)।