नच नश्यदवस्थायां स्वाकार्यं तस्य युज्यते ।
कृत्वा कार्यं विनश्येच्चेत् क्षणान्तरमवस्थितिः ॥५१॥
naca naśyadavasthāyāṃ svākāryaṃ tasya yujyate |
kṛtvā kāryaṃ vinaśyeccet kṣaṇāntaramavasthitiḥ
और नष्ट होती हुई अवस्था में उसका अपना कार्य (करना) सम्भव नहीं; और यदि (वह) कार्य करके (फिर) नष्ट हो, तो (दूसरे) क्षण में अवस्थिति (टिकना आ पड़ता है — फिर क्षणिकता का नाश)।