प्रकाशतात्मन्यचले सच प्रोक्तोऽप्यनश्वरः ।
ज्ञानस्य करणत्वेन भवेच्चेदनवस्थितिः ॥४८॥
prakāśatātmanyacale saca prokto'pyanaśvaraḥ |
jñānasya karaṇatvena bhaveccedanavasthitiḥ
प्रकाशता अचल आत्मा में (निवास करती है); और वह (प्रकाशता), यद्यपि (इस रूप में) कही गई है, अनश्वर (अविनाशी) है। (किन्तु) यदि ज्ञान को (स्वयं) करण (साधन, जिसे दूसरा ज्ञान प्रकट करे) माना जाए, तो अनवस्थिति (अनवस्था) हो जाएगी।