The Vision of Śiva· 6.48 / 126

The Vision of Śiva6.48

6.48
प्रकाशतात्मन्यचले सच प्रोक्तोऽप्यनश्वरः । ज्ञानस्य करणत्वेन भवेच्चेदनवस्थितिः ॥४८॥
prakāśatātmanyacale saca prokto'pyanaśvaraḥ | jñānasya karaṇatvena bhaveccedanavasthitiḥ
— प्रकाशता ; — आत्मा में ; — अचल ; — और वह (प्रकाशता) ; — कही गई होने पर भी ; — अनश्वर ; — ज्ञान को ; — करण (साधन) मानने पर ; — यदि हो ; — अनवस्थिति (अनवस्था)

प्रकाशता अचल आत्मा में (निवास करती है); और वह (प्रकाशता), यद्यपि (इस रूप में) कही गई है, अनश्वर (अविनाशी) है। (किन्तु) यदि ज्ञान को (स्वयं) करण (साधन, जिसे दूसरा ज्ञान प्रकट करे) माना जाए, तो अनवस्थिति (अनवस्था) हो जाएगी।