The Vision of Śiva· 6.49 / 126

The Vision of Śiva6.49

6.49
दीपचक्षुः क्रमफलदर्शनात्तदबाधकम् । भावे कथं विनाशित्वं स्याद्विना कारणान्तरम् ॥४९॥
dīpacakṣuḥ kramaphaladarśanāttadabādhakam | bhāve kathaṃ vināśitvaṃ syādvinā kāraṇāntaram
— दीप और चक्षु ; — क्रम से फल के दर्शन से ; — वह अबाधक ; — भाव (सत् वस्तु) में ; — कैसे ; — विनाशित्व ; — हो ; — बिना अन्य कारण के

दीप और चक्षु (ज्ञान देते हैं); और क्रम से फल के दर्शन से वह (करणत्व आत्मा के कर्तृत्व का) अबाधक (विरोधी नहीं) है। (किन्तु) किसी भाव (सत् वस्तु) में, बिना किसी अन्य कारण के, विनाशित्व कैसे हो?