दीपचक्षुः क्रमफलदर्शनात्तदबाधकम् ।
भावे कथं विनाशित्वं स्याद्विना कारणान्तरम् ॥४९॥
dīpacakṣuḥ kramaphaladarśanāttadabādhakam |
bhāve kathaṃ vināśitvaṃ syādvinā kāraṇāntaram
दीप और चक्षु (ज्ञान देते हैं); और क्रम से फल के दर्शन से वह (करणत्व आत्मा के कर्तृत्व का) अबाधक (विरोधी नहीं) है। (किन्तु) किसी भाव (सत् वस्तु) में, बिना किसी अन्य कारण के, विनाशित्व कैसे हो?