The Vision of Śiva· 6.43 / 126

The Vision of Śiva6.43

6.43
उत्पत्तिकाले स्वात्मानं किमादौ वेत्ति वा बहिः । प्रतिभासस्य वैचित्र्याद्युगपद्ग्रहणं कथम् ॥४३॥
utpattikāle svātmānaṃ kimādau vetti vā bahiḥ | pratibhāsasya vaicitryādyugapadgrahaṇaṃ katham
— उत्पत्ति के समय ; — अपने आत्मा को ; — क्या पहले ; — जानता है ; — अथवा बाह्य को ; — आभास (प्रतिभास) के ; — वैचित्र्य के कारण ; — युगपत् ग्रहण ; — कैसे

उत्पत्ति के समय (ज्ञान) क्या पहले अपने आत्मा को जानता है, अथवा बाह्य (विषय) को? और आभास (प्रतिभास) के वैचित्र्य के कारण युगपत् (एक साथ दोनों का) ग्रहण कैसे (हो)?