ज्ञानात्पूर्वमिच्छाजाते ज्ञातृकल्पनमुज्ज्वलम् ।
न घटो निर्विशेषोऽस्ति ग्रहे यज्ज्ञातृशुद्धता ॥४२॥
jñānātpūrvamicchājāte jñātṛkalpanamujjvalam |
na ghaṭo nirviśeṣo'sti grahe yajjñātṛśuddhatā
जब ज्ञान से पहले इच्छा उत्पन्न होती है, तब ज्ञाता की कल्पना उज्ज्वल (स्पष्ट) हो जाती है; और घट निर्विशेष (विशेष-रहित) रूप में (ग्रहीत) नहीं होता, क्योंकि ग्रहण में ज्ञाता की शुद्धता (का प्रकाश रहता है)।