The Vision of Śiva· 6.42 / 126

The Vision of Śiva6.42

6.42
ज्ञानात्पूर्वमिच्छाजाते ज्ञातृकल्पनमुज्ज्वलम् । न घटो निर्विशेषोऽस्ति ग्रहे यज्ज्ञातृशुद्धता ॥४२॥
jñānātpūrvamicchājāte jñātṛkalpanamujjvalam | na ghaṭo nirviśeṣo'sti grahe yajjñātṛśuddhatā
— ज्ञान से पहले ; — इच्छा उत्पन्न होने पर ; — ज्ञाता की कल्पना ; — उज्ज्वल (स्पष्ट) ; — नहीं घट ; — निर्विशेष (विशेष-रहित) ; — होता ; — ग्रहण में ; — क्योंकि ; — ज्ञाता की शुद्धता

जब ज्ञान से पहले इच्छा उत्पन्न होती है, तब ज्ञाता की कल्पना उज्ज्वल (स्पष्ट) हो जाती है; और घट निर्विशेष (विशेष-रहित) रूप में (ग्रहीत) नहीं होता, क्योंकि ग्रहण में ज्ञाता की शुद्धता (का प्रकाश रहता है)।