The Vision of Śiva· 6.36 / 126

The Vision of Śiva6.36

6.36
अक्रमत्वेऽस्मन्मतत्वं तदैक्यं परिनिष्ठया । नचापि क्षणभंगित्वे युक्ता वैनाशिकी स्थितिः ॥३६॥
akramatve'smanmatatvaṃ tadaikyaṃ pariniṣṭhayā | nacāpi kṣaṇabhaṃgitve yuktā vaināśikī sthitiḥ
— अक्रम (युगपत्) होने पर ; — हमारे ही मत-रूप ; — उनकी एकता ; — परिनिष्ठा (पूर्णता) के साथ ; — और न ही ; — क्षण-भंगित्व में ; — युक्त ; — वैनाशिकी (नाशवादी) स्थिति

और अक्रम (युगपत् ग्रहण) मानने पर तो (वह) हमारे ही मत-रूप (हो जाता है) — उनकी (ग्राह्य-ग्राहक की) एकता, परिनिष्ठा (पूर्णता) के साथ; और न ही क्षण-भंगित्व (क्षणिकता) में वैनाशिकी (नाशवादी) स्थिति युक्त है।