अक्रमत्वेऽस्मन्मतत्वं तदैक्यं परिनिष्ठया ।
नचापि क्षणभंगित्वे युक्ता वैनाशिकी स्थितिः ॥३६॥
akramatve'smanmatatvaṃ tadaikyaṃ pariniṣṭhayā |
nacāpi kṣaṇabhaṃgitve yuktā vaināśikī sthitiḥ
और अक्रम (युगपत् ग्रहण) मानने पर तो (वह) हमारे ही मत-रूप (हो जाता है) — उनकी (ग्राह्य-ग्राहक की) एकता, परिनिष्ठा (पूर्णता) के साथ; और न ही क्षण-भंगित्व (क्षणिकता) में वैनाशिकी (नाशवादी) स्थिति युक्त है।