The Vision of Śiva· 6.35 / 126

The Vision of Śiva6.35

6.35
कर्तृत्वे ज्ञप्तिमात्रत्वे आकांक्षा करणे भवेत् । द्विरूपत्वे विरुद्धत्वसंक्रमत्वं प्रवर्तते ॥३५॥
kartṛtve jñaptimātratve ākāṃkṣā karaṇe bhavet | dvirūpatve viruddhatvasaṃkramatvaṃ pravartate
— कर्ता होने पर ; — ज्ञप्ति-मात्र होने पर ; — आकांक्षा (अपेक्षा) ; — करण की ; — होगी ; — द्विरूप होने पर ; — विरुद्ध-धर्मों में संक्रमण ; — प्रवृत्त होता है

यदि (ज्ञान को) कर्ता (मानो), अथवा ज्ञप्ति-मात्र (मानो), तो करण की अपेक्षा (आकांक्षा) होगी; और द्विरूप (कर्ता-करण दोनों) मानने पर विरुद्ध-धर्मों में संक्रमण प्रवृत्त होता है।