कर्तृत्वे ज्ञप्तिमात्रत्वे आकांक्षा करणे भवेत् ।
द्विरूपत्वे विरुद्धत्वसंक्रमत्वं प्रवर्तते ॥३५॥
kartṛtve jñaptimātratve ākāṃkṣā karaṇe bhavet |
dvirūpatve viruddhatvasaṃkramatvaṃ pravartate
यदि (ज्ञान को) कर्ता (मानो), अथवा ज्ञप्ति-मात्र (मानो), तो करण की अपेक्षा (आकांक्षा) होगी; और द्विरूप (कर्ता-करण दोनों) मानने पर विरुद्ध-धर्मों में संक्रमण प्रवृत्त होता है।