कामिनां कथमेतच्चेदुक्ता प्रागस्य सत्यता ।
ज्ञानस्य करणत्वेन कर्त्रपेक्षा प्रसज्यते ॥३४॥
kāmināṃ kathametacceduktā prāgasya satyatā |
jñānasya karaṇatvena kartrapekṣā prasajyate
यदि (कोई पूछे,) कामियों (काम-मोहितों) के समान, 'यह (असत् का ग्रहण) कैसे (सम्भव)?' — तो इस (वस्तु) की सत्यता पहले (हमारे द्वारा) कही जा चुकी है। और (उनके मत में) ज्ञान को करण (साधन) मानने से कर्ता की अपेक्षा आ पड़ती है।