The Vision of Śiva· 6.34 / 126

The Vision of Śiva6.34

6.34
कामिनां कथमेतच्चेदुक्ता प्रागस्य सत्यता । ज्ञानस्य करणत्वेन कर्त्रपेक्षा प्रसज्यते ॥३४॥
kāmināṃ kathametacceduktā prāgasya satyatā | jñānasya karaṇatvena kartrapekṣā prasajyate
— कामियों (काम-मोहितों) के ; — यह कैसे ; — यदि ; — कही गई ; — पहले ; — इस (वस्तु) की ; — सत्यता ; — ज्ञान को ; — करण (साधन) होने के नाते ; — कर्ता की अपेक्षा ; — आ पड़ती है

यदि (कोई पूछे,) कामियों (काम-मोहितों) के समान, 'यह (असत् का ग्रहण) कैसे (सम्भव)?' — तो इस (वस्तु) की सत्यता पहले (हमारे द्वारा) कही जा चुकी है। और (उनके मत में) ज्ञान को करण (साधन) मानने से कर्ता की अपेक्षा आ पड़ती है।