प्रकृत्यादीश्वरत्वेन सर्वदैव तदात्मता ।
संवित्तिशून्यब्रह्मत्ववादिनां जडतैव सा ॥२९॥
prakṛtyādīśvaratvena sarvadaiva tadātmatā |
saṃvittiśūnyabrahmatvavādināṃ jaḍataiva sā
(हमारे मत में, दूसरी ओर,) प्रकृति आदि पर (शिव के) ईश्वरत्व के कारण सर्वदा ही तदात्मता (उसी का आत्म-भाव) है। किन्तु जो संवित्ति-शून्य (चैतन्य-रहित) ब्रह्म का वाद करते हैं, उनके लिए वह (ब्रह्म) जड़ता ही है।