The Vision of Śiva· 6.28 / 126

The Vision of Śiva6.28

6.28
पृथक्त्वमीश्वरस्यास्ति सर्वात्मभ्यः पृथक्कुतः । न्यायवैशेषिकाणां तु बन्धमोक्षौ पृथक्स्थिती ॥२८॥
pṛthaktvamīśvarasyāsti sarvātmabhyaḥ pṛthakkutaḥ | nyāyavaiśeṣikāṇāṃ tu bandhamokṣau pṛthaksthitī
— पृथक्त्व ; — ईश्वर का ; — है ; — समस्त आत्माओं से ; — पृथक् कहाँ से ; — किन्तु नैयायिक-वैशेषिकों के (मत में) ; — बन्ध और मोक्ष ; — पृथक् स्थितियाँ

(उनके मत में) ईश्वर का समस्त आत्माओं से पृथक्त्व है — किन्तु ऐसा पृथक्त्व कहाँ से (बने)? और नैयायिक-वैशेषिकों के (मत में) बन्ध और मोक्ष पृथक् स्थितियाँ हैं।