स्वाविद्याप्रक्षयादर्हन्देवो भवति निश्चितम् ।
येषां देवो निराकारः शून्य एव किमुच्यते ॥२६॥
svāvidyāprakṣayādarhandevo bhavati niścitam |
yeṣāṃ devo nirākāraḥ śūnya eva kimucyate
(वे मानते हैं कि) अपनी अविद्या के प्रक्षय (नाश) से अर्हन् निश्चित रूप से देव हो जाता है। और जिनका देव निराकार, सर्वथा शून्य (ही) है — (उनके विषय में) क्या (ही) कहा जाए (इतने रिक्त मत के विषय में)?