The Vision of Śiva· 6.26 / 126

The Vision of Śiva6.26

6.26
स्वाविद्याप्रक्षयादर्हन्देवो भवति निश्चितम् । येषां देवो निराकारः शून्य एव किमुच्यते ॥२६॥
svāvidyāprakṣayādarhandevo bhavati niścitam | yeṣāṃ devo nirākāraḥ śūnya eva kimucyate
— अपनी अविद्या के प्रक्षय (नाश) से ; — अर्हन् ; — देव ; — हो जाता है ; — निश्चित रूप से ; — जिनका ; — देव ; — निराकार ; — सर्वथा शून्य ; — क्या कहा जाए

(वे मानते हैं कि) अपनी अविद्या के प्रक्षय (नाश) से अर्हन् निश्चित रूप से देव हो जाता है। और जिनका देव निराकार, सर्वथा शून्य (ही) है — (उनके विषय में) क्या (ही) कहा जाए (इतने रिक्त मत के विषय में)?