The Vision of Śiva· 6.25 / 126

The Vision of Śiva6.25

6.25
प्रतिदेहं न विभवः ते प्रबुद्धास्तु तन्मयाः । इत्येवमाहुस्तेषामप्यविद्यायोगकल्पनम् ॥२५॥
pratidehaṃ na vibhavaḥ te prabuddhāstu tanmayāḥ | ityevamāhusteṣāmapyavidyāyogakalpanam
— प्रत्येक देह में ; — नहीं विभुता ; — वे (जीव) ; — किन्तु प्रबुद्ध होने पर ; — तन्मय (जिन-स्वरूप) ; — ऐसा वे कहते हैं ; — उनके लिए भी ; — अविद्या के योग की कल्पना

(वे मानते हैं कि) प्रत्येक देह में (जीव की) विभुता नहीं; किन्तु प्रबुद्ध होने पर वे (जीव) तन्मय (जिन-स्वरूप) हो जाते हैं। ऐसा वे कहते हैं — (किन्तु) उनके लिए भी अविद्या के योग की कल्पना (है, और वही दोष आते हैं)।