The Vision of Śiva· 6.24 / 126

The Vision of Śiva6.24

6.24
करोति विद्यासंयोगं तर्ह्यन्येश्वरकल्पना । आर्हतास्तु जिनो देवो जीवाः सन्ति पृथक् पृथक् ॥२४॥
karoti vidyāsaṃyogaṃ tarhyanyeśvarakalpanā | ārhatāstu jino devo jīvāḥ santi pṛthak pṛthak
— करता है ; — विद्या-संयोग ; — तो ; — अन्य ईश्वर की कल्पना ; — किन्तु आर्हत (जैन) ; — जिन देव ; — जीव ; — हैं ; — पृथक्-पृथक्

(यदि कोई) विद्या-संयोग करता है, तो (एक) अन्य ईश्वर की कल्पना (आ पड़ेगी, और यों अनवस्था)। किन्तु आर्हत (जैन) (मानते हैं कि) जिन (उनका) देव है, और जीव पृथक्-पृथक् हैं।