करोति विद्यासंयोगं तर्ह्यन्येश्वरकल्पना ।
आर्हतास्तु जिनो देवो जीवाः सन्ति पृथक् पृथक् ॥२४॥
karoti vidyāsaṃyogaṃ tarhyanyeśvarakalpanā |
ārhatāstu jino devo jīvāḥ santi pṛthak pṛthak
(यदि कोई) विद्या-संयोग करता है, तो (एक) अन्य ईश्वर की कल्पना (आ पड़ेगी, और यों अनवस्था)। किन्तु आर्हत (जैन) (मानते हैं कि) जिन (उनका) देव है, और जीव पृथक्-पृथक् हैं।