एवं तथा शक्तिमतः शक्तस्य समवस्थिता ।
जगद्विचित्रता शैवे न पुनर्दर्शनान्तरे ॥२॥
evaṃ tathā śaktimataḥ śaktasya samavasthitā |
jagadvicitratā śaive na punardarśanāntare
इसी प्रकार, शक्त (समर्थ) शक्तिमान् की जगत्-विचित्रता शैव (मत) में भली-भाँति स्थित है, किन्तु अन्य किसी दर्शन में नहीं (— जैसा आगे की समीक्षा से स्पष्ट होगा)।