The Vision of Śiva· 6.15 / 126

The Vision of Śiva6.15

6.15
सर्वेषामप्यविद्यैव कल्प्या ब्रह्मणि संगता । तथा भावेष्वसत्यत्वमित्यवश्यमवस्थितम् ॥१५॥
sarveṣāmapyavidyaiva kalpyā brahmaṇi saṃgatā | tathā bhāveṣvasatyatvamityavaśyamavasthitam
— उन सब के लिए भी ; — अविद्या ही ; — कल्पनीय ; — ब्रह्म में ; — संगत (जुड़ी) ; — इसी प्रकार ; — भावों में ; — असत्यत्व ; — इस प्रकार ; — अनिवार्य रूप से ; — प्राप्त

उन सब के लिए भी अविद्या ही ब्रह्म में संगत (जुड़ी हुई) कल्पनीय है; और इस प्रकार भावों में असत्यत्व अनिवार्य रूप से प्राप्त होता है (— जिसे हम अस्वीकार करते हैं, क्योंकि हमारे लिए सब सत्य शिव है)।