The Vision of Śiva· 6.13 / 126

The Vision of Śiva6.13

6.13
देहे देहे पृथक्त्वे तु तथा भेदो भवात्मकः । जलधारांशुमन्न्यायो येषां वा समवस्थितः ॥१३॥
dehe dehe pṛthaktve tu tathā bhedo bhavātmakaḥ | jaladhārāṃśumannyāyo yeṣāṃ vā samavasthitaḥ
— प्रत्येक देह में ; — किन्तु पृथक्त्व में ; — उसी प्रकार ; — भेद ; — संसार-रूप ; — जल-धारा और (सूर्य की) किरण का न्याय ; — अथवा जिनका ; — स्थित

किन्तु प्रत्येक देह में, उनके पृथक्त्व में, उसी प्रकार संसार-रूप भेद है; अथवा जिनका (मत) जल-धारा और (उसमें प्रतिबिम्बित सूर्य की) किरण के न्याय (दृष्टान्त) पर स्थित है।