देहे देहे पृथक्त्वे तु तथा भेदो भवात्मकः ।
जलधारांशुमन्न्यायो येषां वा समवस्थितः ॥१३॥
dehe dehe pṛthaktve tu tathā bhedo bhavātmakaḥ |
jaladhārāṃśumannyāyo yeṣāṃ vā samavasthitaḥ
किन्तु प्रत्येक देह में, उनके पृथक्त्व में, उसी प्रकार संसार-रूप भेद है; अथवा जिनका (मत) जल-धारा और (उसमें प्रतिबिम्बित सूर्य की) किरण के न्याय (दृष्टान्त) पर स्थित है।