युगपत्सर्वकार्याद्वा संमतत्वादमत्सरात् ।
तावता विश्वसम्पत्तेः सर्वज्ञत्वादचित्रता ॥१२४॥
yugapatsarvakāryādvā saṃmatatvādamatsarāt |
tāvatā viśvasampatteḥ sarvajñatvādacitratā
अथवा — (उनके) एक साथ समस्त कार्य के (सम्पादन) से, परस्पर संमतता (सहमति) से, मात्सर्य (ईर्ष्या) से रहित होने से, और इतने से ही विश्व-सम्पत्ति (समस्त की सिद्धि) के कारण — सर्वज्ञता के कारण (मुक्तों में किसी विसंवादी) चित्रता (वैविध्य) का अभाव (रहता) है।