एकस्यैवात्मनो यद्वदङ्गभेदो विचित्रता ।
युगपद्बन्धपीडादिस्तद्वन्नानाशरीरता ॥११८॥
ekasyaivātmano yadvadaṅgabhedo vicitratā |
yugapadbandhapīḍādistadvannānāśarīratā
जैसे एक ही आत्मा के अंग-भेद (अवयव-भेद), विचित्रता (विविधता), तथा एक साथ (भिन्न अंगों में) बन्ध, पीड़ा आदि होते हैं — उसी प्रकार नानाशरीरता (अनेक शरीरों की बहुलता एक ही शिव में अन्तर्भूत है)।