The Vision of Śiva· 6.117 / 126

The Vision of Śiva6.117

6.117
दूषणं संप्रसज्येत न तथेह कदाचन । एकत्वे बन्धताद्यस्ति द्विषः कादिषु ते यथा? ॥११७॥
dūṣaṇaṃ saṃprasajyeta na tatheha kadācana | ekatve bandhatādyasti dviṣaḥ kādiṣu te yathā?
— दूषण ; — संप्रसक्त हो जाएगा ; — वैसा नहीं ; — यहाँ (हमारे मत में) ; — कभी ; — (इस) एकत्व में ; — बन्धता आदि ; — रहती है (दृष्टिकोण रूप में) ; — द्वेषी का ; — क-आदि (वर्णों) में ; — आपके लिए ; — जैसे

(अन्य दर्शन में) दूषण (दोष) संप्रसक्त हो जाएगा; यहाँ (हमारे मत में) वैसा कभी नहीं। (इस) एकत्व में बन्धता आदि (केवल दृष्टिकोण के रूप में) रहती हैं — जैसे आपके लिए, द्वेषी (और मित्र) का (भेद केवल) क-आदि (वर्णों जैसे व्यावहारिक संकेतों) में (रहता है, वस्तुतः नहीं)।