The Vision of Śiva· 6.109 / 126

The Vision of Śiva6.109

6.109
संसारस्यानुपाल्यत्वाद्द्वेषादिमलहानितः । अथवा स्वात्मविभवपरमानन्दतृप्तितः ॥१०९॥
saṃsārasyānupālyatvāddveṣādimalahānitaḥ | athavā svātmavibhavaparamānandatṛptitaḥ
— संसार का ; — अनुपाल्य होने के कारण ; — द्वेष आदि मलों के हान से ; — अथवा ; — अपने आत्मा के विभव के परमानन्द में तृप्ति के कारण

(मुक्त जन संसार को बनाए रखने के लिए कर्म नहीं करते,) क्योंकि संसार अनुपाल्य (पालनीय नहीं) है; (यह) द्वेष आदि मलों के हान (त्याग) से (होता है); अथवा अपने ही आत्मा के विभव (ऐश्वर्य) के परमानन्द में तृप्ति के कारण।