संसारस्यानुपाल्यत्वाद्द्वेषादिमलहानितः ।
अथवा स्वात्मविभवपरमानन्दतृप्तितः ॥१०९॥
saṃsārasyānupālyatvāddveṣādimalahānitaḥ |
athavā svātmavibhavaparamānandatṛptitaḥ
(मुक्त जन संसार को बनाए रखने के लिए कर्म नहीं करते,) क्योंकि संसार अनुपाल्य (पालनीय नहीं) है; (यह) द्वेष आदि मलों के हान (त्याग) से (होता है); अथवा अपने ही आत्मा के विभव (ऐश्वर्य) के परमानन्द में तृप्ति के कारण।