तन्निष्ठत्वात् पञ्चविधकृत्यस्योन्मुखतैव नो ।
भवेन्मुक्तात्मभेऽपि सा त्वनादौ शिवे स्थिता ॥११०॥
tanniṣṭhatvāt pañcavidhakṛtyasyonmukhataiva no |
bhavenmuktātmabhe'pi sā tvanādau śive sthitā
उस (आनन्द) में निष्ठा (अवस्थिति) होने के कारण, पंचविध कृत्य के प्रति उन्मुखता (अभिमुखता) ही उत्पन्न नहीं होगी, उस प्रकाशमान मुक्त आत्मा में भी; किन्तु वह (पंचविध क्रिया) अनादि शिव में (नित्य) अवस्थित रहती है।