The Vision of Śiva· 6.110 / 126

The Vision of Śiva6.110

6.110
तन्निष्ठत्वात् पञ्चविधकृत्यस्योन्मुखतैव नो । भवेन्मुक्तात्मभेऽपि सा त्वनादौ शिवे स्थिता ॥११०॥
tanniṣṭhatvāt pañcavidhakṛtyasyonmukhataiva no | bhavenmuktātmabhe'pi sā tvanādau śive sthitā
— उस (आनन्द) में निष्ठा के कारण ; — पंचविध कृत्य की ; — उन्मुखता ही ; — उत्पन्न नहीं होगी ; — प्रकाशमान मुक्त आत्मा में भी ; — किन्तु वह (क्रिया) ; — अनादि शिव में ; — अवस्थित

उस (आनन्द) में निष्ठा (अवस्थिति) होने के कारण, पंचविध कृत्य के प्रति उन्मुखता (अभिमुखता) ही उत्पन्न नहीं होगी, उस प्रकाशमान मुक्त आत्मा में भी; किन्तु वह (पंचविध क्रिया) अनादि शिव में (नित्य) अवस्थित रहती है।