The Vision of Śiva· 6.111 / 126

The Vision of Śiva6.111

6.111
अनुवृत्तिः किमाधिक्याद्रागाद् वा तर्हि दूषणम् । अनादिशिवतत्त्वस्य स्वामोदं किं न विद्यते ॥१११॥
anuvṛttiḥ kimādhikyādrāgād vā tarhi dūṣaṇam | anādiśivatattvasya svāmodaṃ kiṃ na vidyate
— (यह) अनुवृत्ति ; — क्या? ; — आधिक्य से ; — अथवा राग से ; — तब ; — दूषण ; — अनादि शिवतत्त्व का ; — अपना आमोद (आनन्द) ; — क्या नहीं है?

(आक्षेप:) (शिव की) यह अनुवृत्ति (निरन्तर प्रवृत्ति) क्या आधिक्य (श्रेष्ठता) से है, अथवा राग (आसक्ति) से? — तब (उनमें) दूषण (दोष) होगा। (उत्तर:) क्या अनादि शिवतत्त्व का अपना (स्वतःस्फूर्त) आमोद (आनन्द) नहीं है (— जो किसी दोष से रहित है)?