अनुवृत्तिः किमाधिक्याद्रागाद् वा तर्हि दूषणम् ।
अनादिशिवतत्त्वस्य स्वामोदं किं न विद्यते ॥१११॥
anuvṛttiḥ kimādhikyādrāgād vā tarhi dūṣaṇam |
anādiśivatattvasya svāmodaṃ kiṃ na vidyate
(आक्षेप:) (शिव की) यह अनुवृत्ति (निरन्तर प्रवृत्ति) क्या आधिक्य (श्रेष्ठता) से है, अथवा राग (आसक्ति) से? — तब (उनमें) दूषण (दोष) होगा। (उत्तर:) क्या अनादि शिवतत्त्व का अपना (स्वतःस्फूर्त) आमोद (आनन्द) नहीं है (— जो किसी दोष से रहित है)?