या पुनः सर्वसदृशी सानुसार्या किमुच्यते ।
सर्वज्ञत्वेन सर्वेषामेककार्यानुवर्तनात् ॥१०८॥
yā punaḥ sarvasadṛśī sānusāryā kimucyate |
sarvajñatvena sarveṣāmekakāryānuvartanāt
और जो (भूमि) सर्वसदृशी (सबके समान — परस्पर अनुकूल) है, वही अनुसरणीय (समस्वर अवस्था) है; (उसके विषय में) क्या कहा जाए? — क्योंकि सर्वज्ञता के कारण सबका एक ही कार्य में अनुवर्तन (अनुरूप प्रवृत्ति) होता है (— अतः हमारे मत में कोई गतिरोध नहीं उठता)।