तस्याधिकमहेशित्वे मोक्षे न्यूनाधिके स्थितिः ।
बहूनां नायकत्वेऽपि नायकत्वं विहन्यते ॥१०६॥
tasyādhikamaheśitve mokṣe nyūnādhike sthitiḥ |
bahūnāṃ nāyakatve'pi nāyakatvaṃ vihanyate
यदि उनमें से (एक) का अधिक महेशित्व (श्रेष्ठ स्वामित्व) हो, तो मोक्ष में न्यून-अधिक (की तरतमता) की स्थिति (बन जाएगी); और बहुतों के नायकत्व (स्वामित्व) होने पर भी (प्रत्येक का) नायकत्व विहत (खण्डित) हो जाता है (— अतः बहुत्व का मत असंगत है)।