तद्बाधे न परव्याप्तिर्न वाव्याप्तेस्तदात्मता ।
मोक्षेऽपि शिवबाहुल्यान्नानानायकता भवेत् ॥१०५॥
tadbādhe na paravyāptirna vāvyāptestadātmatā |
mokṣe'pi śivabāhulyānnānānāyakatā bhavet
यदि उस (एक बोध) की बाधा (हो), तो अन्य के द्वारा व्याप्ति नहीं (होती); अथवा व्याप्ति न होने से (किसी देह की) उसमें आत्मता नहीं (बनती)। और मोक्ष में भी, अनेक शिवों के बाहुल्य (बहुलता) से, अनेक नायकता (बहु-स्वामित्व) उत्पन्न हो जाएगी (— जिस आक्षेप का अब हम निरसन करते हैं)।