The Vision of Śiva· 6.104 / 126

The Vision of Śiva6.104

6.104
तत्र कर्म निमित्तं चेद्योगेनाप्यत्र संक्रमः । एकबोधो बोधशतैरभिभूतो भवेत्तदा ॥१०४॥
tatra karma nimittaṃ cedyogenāpyatra saṃkramaḥ | ekabodho bodhaśatairabhibhūto bhavettadā
— वहाँ ; — कर्म ; — निमित्त ; — यदि (आप कहें) ; — योग के द्वारा भी ; — यहाँ ; — संक्रम (प्रवेश) ; — एक बोध ; — सैकड़ों बोधों के द्वारा ; — अभिभूत ; — तब हो जाएगा

यदि (आप कहें) वहाँ कर्म निमित्त है — (तो भी) यहाँ भी (योगी का) संक्रम (प्रवेश) योग के द्वारा (होता है, कर्म से नहीं); और (आपके अणुवाद में) तब एक बोध सैकड़ों बोधों के द्वारा अभिभूत हो जाएगा (— एक स्थान में संकुल होकर)।