तत्र कर्म निमित्तं चेद्योगेनाप्यत्र संक्रमः ।
एकबोधो बोधशतैरभिभूतो भवेत्तदा ॥१०४॥
tatra karma nimittaṃ cedyogenāpyatra saṃkramaḥ |
ekabodho bodhaśatairabhibhūto bhavettadā
यदि (आप कहें) वहाँ कर्म निमित्त है — (तो भी) यहाँ भी (योगी का) संक्रम (प्रवेश) योग के द्वारा (होता है, कर्म से नहीं); और (आपके अणुवाद में) तब एक बोध सैकड़ों बोधों के द्वारा अभिभूत हो जाएगा (— एक स्थान में संकुल होकर)।