The Vision of Śiva· 6.103 / 126

The Vision of Śiva6.103

6.103
अकर्महेतुकेऽप्यस्ति योगिनोऽन्यशरीरके । न शवत्वं शरीरे स्यादन्यात्मस्फुरणस्थितेः ॥१०३॥
akarmahetuke'pyasti yogino'nyaśarīrake | na śavatvaṃ śarīre syādanyātmasphuraṇasthiteḥ
— कर्म से अहेतुक (अकारण) में भी ; — रहती है (संवित्) ; — योगी की ; — अन्य के शरीर में ; — शवत्व नहीं ; — शरीर में ; — होगा ; — अन्य आत्मा के स्फुरण की स्थिति के कारण

कर्म से अहेतुक (अकारण) (अवस्था) में भी संवित् रहती है — जैसे योगी की अन्य के शरीर में (प्रवेश में); और (प्रविष्ट) शरीर में शवत्व (मृतकपन) नहीं होगा, क्योंकि (उसमें) अन्य आत्मा का स्फुरण अवस्थित रहता है।