अकर्महेतुकेऽप्यस्ति योगिनोऽन्यशरीरके ।
न शवत्वं शरीरे स्यादन्यात्मस्फुरणस्थितेः ॥१०३॥
akarmahetuke'pyasti yogino'nyaśarīrake |
na śavatvaṃ śarīre syādanyātmasphuraṇasthiteḥ
कर्म से अहेतुक (अकारण) (अवस्था) में भी संवित् रहती है — जैसे योगी की अन्य के शरीर में (प्रवेश में); और (प्रविष्ट) शरीर में शवत्व (मृतकपन) नहीं होगा, क्योंकि (उसमें) अन्य आत्मा का स्फुरण अवस्थित रहता है।