सर्वेषां सर्वदेहस्था संवित्केन निवार्यते ।
कर्मणामानुरूप्याच्चेत् संविद्बाधा न कर्मभिः ॥१०२॥
sarveṣāṃ sarvadehasthā saṃvitkena nivāryate |
karmaṇāmānurūpyāccet saṃvidbādhā na karmabhiḥ
समस्त देहों में स्थित सबकी संवित् (अनुभूति) किसके द्वारा निवारित की जाती है? यदि (आप कहें) कर्मों के आनुरूप्य (अनुसार) — (तो हम उत्तर देते हैं) कर्मों के द्वारा संवित् की (वास्तविक) बाधा नहीं (होती — कर्म अधिक से अधिक आवरण करते हैं, उच्छेद नहीं)।