The Vision of Śiva· 6.102 / 126

The Vision of Śiva6.102

6.102
सर्वेषां सर्वदेहस्था संवित्केन निवार्यते । कर्मणामानुरूप्याच्चेत् संविद्बाधा न कर्मभिः ॥१०२॥
sarveṣāṃ sarvadehasthā saṃvitkena nivāryate | karmaṇāmānurūpyāccet saṃvidbādhā na karmabhiḥ
— सबकी ; — समस्त देहों में स्थित ; — संवित् ; — किसके द्वारा ; — निवारित की जाती है? ; — कर्मों के ; — आनुरूप्य के कारण ; — यदि (आप कहें) ; — संवित् की बाधा ; — कर्मों के द्वारा नहीं

समस्त देहों में स्थित सबकी संवित् (अनुभूति) किसके द्वारा निवारित की जाती है? यदि (आप कहें) कर्मों के आनुरूप्य (अनुसार) — (तो हम उत्तर देते हैं) कर्मों के द्वारा संवित् की (वास्तविक) बाधा नहीं (होती — कर्म अधिक से अधिक आवरण करते हैं, उच्छेद नहीं)।