The Vision of Śiva· 6.101 / 126

The Vision of Śiva6.101

6.101
दोषोऽयं भवतामेव नैवमस्मासु तादृशः । सर्वस्य सर्वदेहेषु व्यापकत्वव्यवस्थितेः ॥१०१॥
doṣo'yaṃ bhavatāmeva naivamasmāsu tādṛśaḥ | sarvasya sarvadeheṣu vyāpakatvavyavasthiteḥ
— यह दोष ; — आप ही का ; — इस प्रकार नहीं ; — हमारे (मत) में ; — वैसा (दोष) ; — सबकी ; — समस्त देहों में ; — व्यापकता की व्यवस्था से

यह दोष आप ही का है; हमारे (मत) में वैसा (दोष) इस प्रकार नहीं (उठता), क्योंकि समस्त देहों में सबकी व्यापकता (पहले से) व्यवस्थित है (— एक ही संवित् सबमें व्याप्त रहती है)।