दोषोऽयं भवतामेव नैवमस्मासु तादृशः ।
सर्वस्य सर्वदेहेषु व्यापकत्वव्यवस्थितेः ॥१०१॥
doṣo'yaṃ bhavatāmeva naivamasmāsu tādṛśaḥ |
sarvasya sarvadeheṣu vyāpakatvavyavasthiteḥ
यह दोष आप ही का है; हमारे (मत) में वैसा (दोष) इस प्रकार नहीं (उठता), क्योंकि समस्त देहों में सबकी व्यापकता (पहले से) व्यवस्थित है (— एक ही संवित् सबमें व्याप्त रहती है)।