The Vision of Śiva· 6.100 / 126

The Vision of Śiva6.100

6.100
वर्तते यदि तत्रान्यो न व्याप्तोऽसौ पुरापरैः । आकाशबुद्धिचित्तादेः कथमेकत्र चेत् स्थितिः ॥१००॥
vartate yadi tatrānyo na vyāpto'sau purāparaiḥ | ākāśabuddhicittādeḥ kathamekatra cet sthitiḥ
— अवस्थित होता है ; — यदि ; — वहाँ ; — अन्य (अणु) ; — व्याप्त नहीं ; — यह (स्थान) ; — पूर्व से अन्यों के द्वारा ; — आकाश, बुद्धि, चित्त आदि की ; — कैसे ; — यदि (आक्षेप) एक स्थान में ; — स्थिति

यदि वहाँ अन्य (अणु) अवस्थित होता है, तो यह (स्थान) पूर्व से अन्यों के द्वारा व्याप्त नहीं (हुआ — अतः वस्तुवादी के अणु सह-अवस्थित नहीं हो सकते)। (और यदि आप आक्षेप करें:) तब आकाश, बुद्धि, चित्त आदि की एक स्थान में स्थिति कैसे (होती है — उसका उत्तर हमारे पास है)?