एकक्षणत्वं लक्ष्यस्य बहुकालस्य नार्हता ।
क्षणभङ्गान्नचैवं हि स निवार्य इहाग्रतः ॥९७॥
ekakṣaṇatvaṃ lakṣyasya bahukālasya nārhatā |
kṣaṇabhaṅgānnacaivaṃ hi sa nivārya ihāgrataḥ
दीर्घकाल वाले (स्थायी) लक्ष्य (वस्तु) की एक-क्षणता उचित नहीं; और (यह) ऐसा नहीं है, (जैसा) क्षण-भंग से (फलित होता); वह (क्षणिकता-मत) यहाँ आगे निवारणीय (खण्डनीय) है।