The Vision of Śiva· 5.97 / 110

The Vision of Śiva5.97

5.97
एकक्षणत्वं लक्ष्यस्य बहुकालस्य नार्हता । क्षणभङ्गान्नचैवं हि स निवार्य इहाग्रतः ॥९७॥
ekakṣaṇatvaṃ lakṣyasya bahukālasya nārhatā | kṣaṇabhaṅgānnacaivaṃ hi sa nivārya ihāgrataḥ
— एक-क्षणता ; — लक्ष्य (वस्तु) की ; — दीर्घकाल वाले की ; — उचित नहीं ; — क्षण-भंग से ; — और ऐसा नहीं ही ; — वह (मत) ; — निवारणीय (खण्डनीय) ; — यहाँ आगे

दीर्घकाल वाले (स्थायी) लक्ष्य (वस्तु) की एक-क्षणता उचित नहीं; और (यह) ऐसा नहीं है, (जैसा) क्षण-भंग से (फलित होता); वह (क्षणिकता-मत) यहाँ आगे निवारणीय (खण्डनीय) है।