तथोत्पत्तौ क्षणानन्त्यमीश्वरेच्छावशादथ ।
क्षण एको नचैवं तच्चेश्वरेच्छाविरोधकृत् ॥९६॥
tathotpattau kṣaṇānantyamīśvarecchāvaśādatha |
kṣaṇa eko nacaivaṃ tacceśvarecchāvirodhakṛt
उसी प्रकार उत्पत्ति में (भी) क्षणों का अनन्त्य (अनन्तता आ पड़ेगी); किन्तु ईश्वर की इच्छा के वश से (ऐसा अनिवार्य नहीं) — (क्योंकि) एक ही क्षण (भी इच्छित किया जा सकता है); और (क्षणिकवादी का अनिवार्य विनाश-) मत ही ईश्वर की इच्छा का विरोध करने वाला है।