कार्यस्य नाशे तत्कार्यकार्ये तत्कार्यनाशिता ।
क्षणलक्षाणि जायन्ते क्रमात्तत्तद्विनाशतः ॥९५॥
kāryasya nāśe tatkāryakārye tatkāryanāśitā |
kṣaṇalakṣāṇi jāyante kramāttattadvināśataḥ
(क्षणिकवादी के मत में) कार्य के नाश में, उस कार्य के कार्य की उस-कार्य-नाशिता (होती है); (इस प्रकार) क्रम से उस-उस के विनाश से लाखों क्षण उत्पन्न होते हैं (— इस मत का अब हम खण्डन करते हैं)।