The Vision of Śiva· 5.93 / 110

The Vision of Śiva5.93

5.93
एतदेव हि युक्तं तु घटादेर्बाह्यमेकतः । कुड्यादिनिर्गताच्चैव योगिनां क्वापि दर्शनात् ॥९३॥
etadeva hi yuktaṃ tu ghaṭāderbāhyamekataḥ | kuḍyādinirgatāccaiva yogināṃ kvāpi darśanāt
— यही (मत) तो ; — युक्त (संगत) ; — निश्चय ही ; — घट आदि की ; — बाह्यता ; — एक ओर से ; — दीवार आदि के पार से (दर्शन) से ; — और भी ; — योगियों के ; — कहीं ; — दर्शन के कारण

यही (मत) तो युक्त (संगत) है: घट आदि की बाह्यता एक ओर से (ही है); और (यह इससे भी पुष्ट होता है कि) योगियों के द्वारा कहीं-कहीं दीवार आदि के पार से (वस्तुओं का) दर्शन (होता है, जो मात्र बाह्यता से सम्भव न हो)।