एतदेव हि युक्तं तु घटादेर्बाह्यमेकतः ।
कुड्यादिनिर्गताच्चैव योगिनां क्वापि दर्शनात् ॥९३॥
etadeva hi yuktaṃ tu ghaṭāderbāhyamekataḥ |
kuḍyādinirgatāccaiva yogināṃ kvāpi darśanāt
यही (मत) तो युक्त (संगत) है: घट आदि की बाह्यता एक ओर से (ही है); और (यह इससे भी पुष्ट होता है कि) योगियों के द्वारा कहीं-कहीं दीवार आदि के पार से (वस्तुओं का) दर्शन (होता है, जो मात्र बाह्यता से सम्भव न हो)।